Tuesday, 29 October 2013

***जय हिंद***: Subject: सोच रहा हूँ किसे जलाऊँइतने हो गये रावणद...

***जय हिंद***:
Subject: सोच रहा हूँ किसे जलाऊँइतने हो गये रावण
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: Subject :   सोच रहा हूँ किसे जलाऊँ इतने हो गये   रावण दशहरे  के पर्व पर मौसम हुआ सुहावन   ;   सोच रहा हूँ   किसे जलाऊं इतने हो गये ...

5 comments:


  1. यहाँ स्कंदमाता की पूजा होती है
    गणेश कार्तिक को भोग लगता है
    और अशोक सुंदरी फुट फुट रोती है

    चंदन नही, रक्त भरे हाथों से
    देवी का शृंगार करते हैं
    गर्भ की कन्याओं का जो
    वंश के नाम संहार करते हैं

    अचरज होता है क्यूँ शक्ति के नाम पर
    नौ दिनो का उपवास होता है
    कहाँ मिलेंगी कंजके लोगों को
    जहाँ गर्भ उनका अंतिम निवास होता है

    कभी मन्त्र से, कभी जाप से
    नर तुमको छल रहा है
    मत आओ इस धरती पर देवी
    यहाँ तो चिरस्थायि
    भद्रकाल चल रहा है
    jai-hind

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  2. वक़्त-

    वक़्त हर चीज़ का होता है
    अपने वक़्त के लिए इंतज़ार करो
    और उस वक़्त के लिए तैयार रहो
    अपनी ज़िंदगी को कभी भी
    किसी नियति पर मत छोड़ो
    ज़िंदगी तुम्हारी है
    जीना तुम्हें है
    अपनी ज़िंदगी खुद बनाओ
    किसी और पर मत छोड़ो
    सहारा कोई भी दे सकते
    मदद किसी से माँग सकते
    लेकिन ज़िंदगी भर....?
    नहीं, नहीं मिलेगा ज़िंदगी भर
    किसी का भी.... !

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